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वो चाहते है हम बंजारों की तरह चले जाएँ

          गांव के घरो की कतारों में सन्नाटा पसरा है, कुछ आवारा कुत्ते टहल रहे है, एक बड़े से आँगन के कोने में बिच्छु घास का झुरमुट दिन पर दिन बड़ रहा है, दीवारों पर पीपल उगी है, लिपाई-पुताई उखड रही है, नक्कासी किये हुए दरवाजे सड रहे है, छोटे-छोटे मंदिरों के समूह में भगवन भी भक्तों के इंतज़ार में है, खेत बंजर पड़े है उनमें चूहों और जंगली जानवरों ने उत्पात मचा रखा है, पानी के धारे सूख गए है, जर्जर अवस्था में नौले क्षीण हो रहे है, गाड़-गधेरों का पानी लुप्त है, जंगलो से बांज, बुरांश और देवदार गायब है.. गांव की रौनक गायब है... बुजुर्गों के सारे किस्से-कहानिया गायब है, बच्चों की हंसी गायब है, महिलाओं की घास, दरांती और रस्सी गायब है... आज चारों तरफ उदासी है, और सरकारी आंकड़े कह रहे है कि ये सब पलायन का नतीजा है. अब पलायन क्यों हो रहा है? किस लिए हो रहा है? कब से हो रहा है? ये तो सब आंकड़े बता रहे है... मगर हम पलायन क्यों करते है ये सबको मालूम है |

















                  अब पृथक राज्य तो बना ही लिया है, मगर इस राज्य के विकास के लिए पृथक काम क्या हुआ है ? सब कुछ वही तो पुराना है, सिर्फ सरकारें बदली है दाज्यू !, फाइलों का रंग वही है, फाइलों में विकास लिखना हम नहीं भूले है, अब 15  साल हो गए अलग राज्य बने, सत्ताधारी बोलते है की विकास हो रहा है आखिर कौन से उत्तराखंड में विकास की गंगा बह रही है सैफ ! हमको भी बता देते हम भी उसी उत्तराखंड में पलायन करते, अब तो दिल्ली जाने का भी मन नहीं करता है यार ! वहां की महंगाई का तो क्या कहना ? फिर भी हम जाते है जाते रहेंगे, जब तक की यहाँ के मूल निवासी ०% न हो जाये और फिर यहाँ की एजेंटनुमा सरकार खुलके बेचेगी ज़मीने, खुलके काटेंगे बांज-देवदार और खुलके दोहन होगा हिमालय का, सत्ता क़े चील-कौव्वे शायद यही चाहते है. वर्ना कुछ तो करते कुछ तो फाइलों से हटके जमीनी विकास करते, तरीका तो होगा ही ना सैफ ! क्यों न होगा ?आखिर इतने पड़े-लिखे ऑफिसर जो है आपके पास या इन्हे भी अपने इशारों में नाचने के लिए खरीद लिया.



                अब सरकार को क्या कहे ? उनकी बातें छोड़ों ! अब कई गांव पलायन से ख़ाली हो रहे है तो चिंता जाहिर है दाज्यू ! हजारों एनजीओ खुले है उनका ध्यान भी नहीं है सब मस्त है, सब पैसों की मोह-माया है, सब ठुल आदिम बनना चाहते है, अच्छी बात है ठुल आदिम बनो ! मगर अपने ज़मीर से एक बार ये जरूर पूछो कि क्या तुम्हारी ये संवेदनहीन सोच उचित है, और याद करो उत्तराखंड जन आंदोलन, याद करो! पहाड़ की गरीबी, समस्या, अशिक्षा, दुर्गम जन जीवन, अस्त ब्यस्त समाज और आजीविका को तरसते हाथ.... छोडो न अब एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप छोड़ते है कृपया मिलजुल के एक उस मुलुक का विकास करते है जहां का आदमी के साथ-साथ वहाँ की सभ्यता और संस्कृति भी पलायन कर रही है. कही तुम ये तो नहीं चाहते हो ना कि हम बंजारों की तरह चले जाएँ  |  

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